Dhyan – Bhagavad Gita Quotes – Hindi

Dhyan Meditation in Gita

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ध्यान – Bhagavad Gita – Adhyay – 2

तानि सर्वाणि संयम्य
युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि
तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ (2 – 61)
  • साधक को चाहिए कि वह
  • सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके
  • समाहित चित्त हुआ
  • मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे
  • क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है।
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ध्यान – Bhagavad Gita – Adhyay – 6

योगी युञ्जीत सततमात्मानं
रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा
निराशीरपरिग्रहः॥ (6 – 10)
  • मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला,
  • आशारहित और संग्रहरहित योगी
  • अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर
  • आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाए।
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शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य
स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं
चैलाजिनकुशोत्तरम्‌॥ (6 – 11)
  • शुद्ध भूमि में,
  • जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं,
  • जो न बहुत ऊँचा और न बहुत नीचा,
  • ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके।
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तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥ (6 – 12)
  • उस आसन पर बैठकर
  • चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए
  • मन को एकाग्र करके
  • अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
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समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌॥ (6 – 13)
  • काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और
  • स्थिर होकर,
  • अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर,
  • अन्य दिशाओं को न देखता हुआ॥13॥
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प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥ (6 – 14)
  • ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित,
  • भयरहित तथा
  • भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी
  • मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और
  • मेरे परायण होकर स्थित होए।
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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥ (6 – 15)
  • वश में किए हुए मनवाला योगी इस प्रकार
  • आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ
  • मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है।
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नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥ (6 – 16)
  • हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का,
  • न बिलकुल न खाने वाले का,
  • न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और
  • न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
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युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥ (6 – 17)
  • दुःखों का नाश करने वाला योग तो
  • यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का,
  • कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और
  • यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
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यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥ (6 – 18)
  • अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त
  • जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है,
  • उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष
  • योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है॥18॥
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यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥ (6 – 19)
  • जिस प्रकार
  • वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता,
  • वैसी ही उपमा
  • परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है।
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यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥ (6 – 20)
  • योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त
  • जिस अवस्था में उपराम हो जाता है –
  • उस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा
  • परमात्मा को साक्षात करता हुआ
  • परमात्मा में ही सन्तुष्ट रहता है।
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अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्‌॥
  • हे पार्थ! यह नियम है कि
  • परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त,
  • दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से
  • निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य
  • परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है॥8॥
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ध्यान – Bhagavad Gita – Adhyay – 9

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥ (9 – 14)
  • दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन
  • निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा
  • मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और
  • मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए
  • सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर
  • अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं।
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ध्यान – Bhagavad Gita – Adhyay – 10

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ (10 – 10)
  • उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और
  • प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को
  • मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ,
  • जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।
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ध्यान – Bhagavad Gita – Adhyay – 12

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ (12 – 2)
  • श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके
  • निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए
    • (अर्थात गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में लिखे हुए प्रकार से निरन्तर मेरे में लगे हुए)
  • जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर
  • मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं,
  • वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं।
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ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌॥ (12 – 3)
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥ (12 – 3)
  • परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके
  • मन-बुद्धि से परे,
  • सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले,
  • नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को
  • निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं,
  • वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और
  • सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं।