Bhagavad Gita in Hindi – Adhyay List

Krishna Arjun Gita Updesh


गीता महात्म्य (भगवद गीता क्यों पढ़े?)

  • जो मनुष्य शुद्ध चित्त होकर प्रेम पूर्वक पवित्र गीता शास्त्र का पाठ करता है,
    • वह भय और शोक आदि से रहित होकर विष्णु धाम को प्राप्त कर लेता है।
  • जो मनुष्य सदा गीता का पाठ करने वाला है,
    • उसके इस जन्म और पूर्व जन्म में किये हुए समस्त पाप निःसंदेह ही नष्ट हो जाते हैं।
  • जल में प्रतिदिन किया हुआ स्नान मनुष्यों के केवल शारीरिक मल का नाश करता है,
    • परन्तु गीता ज्ञान रूप जल में एक बार भी किया हुआ स्नान संसार मल को नष्ट करने वाला है।
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Bhagavad Gita Adhyay 1

अध्याय 1: अर्जुनविषाद-योग

  • दोनों सेनाओं के प्रधान-प्रधान शूरवीरों की गणना और सामर्थ्य।
  • दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि
  • अर्जुन द्वारा सेना-का निरीक्षण
  • मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन
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Bhagavad Gita Adhyay 2

अध्याय 2: सांख्य-योग

  • अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद
  • सांख्ययोग का विषय
  • क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता
  • कर्मयोग का विषय
  • स्थिर बुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा
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Bhagavad Gita Adhyay 3

अध्याय 3: कर्म-योग

  • ज्ञान-योग और कर्म-योग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म का महत्व
  • यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता का वर्णन
  • ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता
  • अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण
  • राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा
  • काम के निरोध का विषय
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Bhagavad Gita Adhyay 4

अध्याय 4: ज्ञान-कर्मसंन्यास-योग

  • सगुण भगवान का प्रभाव
  • कर्मयोग का विषय
  • योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा
  • फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन
  • ज्ञान की महिमा
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Bhagavad Gita Adhyay 5

अध्याय 5: कर्मसंन्यास-योग

  • सांख्य-योग और कर्म-योग का निर्णय
  • सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा
  • ज्ञानयोग का विषय
  • भक्ति सहित ध्यानयोग का वर्णन
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Bhagavad Gita Adhyay 6

अध्याय 6: आत्मसंयम-योग

  • कर्मयोग का विषय
  • योगारूढ़ पुरुष के लक्षण
  • आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा
  • भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण
  • विस्तार से ध्यान योग का विषय
  • मन के निग्रह का विषय
  • योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय
  • ध्यानयोगी की महिमा
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Bhagavad Gita Adhyay 7

अध्याय 7: ज्ञान-विज्ञान-योग

  • विज्ञान सहित ज्ञान का विषय
  • संपूर्ण पदार्थों में कारण रूप से भगवान की व्यापकता का कथन
  • आसुरी स्वभाव वालों की निंदा
  • भगवद्भक्तों की प्रशंसा
  • अन्य देवताओं की उपासना का विषय
  • भगवान के प्रभाव और स्वरूप को न जानने वालों की निंदा
  • भगवान के स्वरूप को जानने वालों की महिमा
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Bhagavad Gita Adhyay 8

अध्याय 8: अक्षरब्रह्म-योग

  • ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर
  • भक्ति योग का विषय
  • शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय
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Bhagavad Gita Adhyay 9

अध्याय 9: राजविद्या-राजगुह्य-योग

  • प्रभावसहित ज्ञान का विषय
  • जगत की उत्पत्ति का विषय
  • भगवान का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निंदा
  • देवी प्रकृति वालों के भगवद् भजन का प्रकार
  • सर्वात्म रूप से प्रभाव सहित भगवान के स्वरूप का वर्णन
  • सकाम और निष्काम उपासना का फल
  • निष्काम भगवद् भक्ति की महिमा
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Bhagavad Gita Adhyay 10

अध्याय 10: विभूति-योग

  • भगवान की विभूति और योगशक्ति का कथन तथा उनके जानने का फल
  • फल और प्रभाव सहित भक्तियोग का कथन
  • अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति तथा विभूति और योगशक्ति को कहने के लिए प्रार्थना
  • भगवान द्वारा अपनी विभूतियों और योगशक्ति का कथन
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Bhagavad Gita Adhyay 11

अध्याय 11: विश्वरूपदर्शन-योग

  • विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना
  • भगवान द्वारा अपने विश्व रूप का वर्णन
  • संजय द्वारा धृतराष्ट्र के प्रति विश्वरूप का वर्णन
  • अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना
  • भगवान द्वारा अपने प्रभाव का वर्णन
  • भगवान द्वारा अर्जुन को युद्ध के लिए उत्साहित करना
  • भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति
  • अर्जुन द्वारा चतुर्भुज रूप का दर्शन कराने के लिए प्रार्थना
  • भगवान द्वारा अपने विश्वरूप के दर्शन की महिमा का कथन
  • भगवान द्वारा चतुर्भुज और सौम्य रूप का दिखाया जाना
  • बिना अनन्य भक्ति के चतुर्भुज रूप के दर्शन की दुर्लभता का और फलसहित अनन्य भक्ति का कथन।
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Bhagavad Gita Adhyay 12

अध्याय 12: भक्ति-योग

  • साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय
  • भगवत्प्राप्ति के उपाय का विषय
  • भगवत्-प्राप्त पुरुषों के लक्षण
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Bhagavad Gita Adhyay 13

अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभाग-योग

  • ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय
  • ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय
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Bhagavad Gita Adhyay 14

अध्याय 14: गुणत्रयविभाग-योग

  • ज्ञान की महिमा
  • प्रकृति-पुरुष से जगत् की उत्पत्ति
  • सत्, रज, तम- तीनों गुणों का विषय
  • भगवत्प्राप्ति का उपाय
  • गुणातीत पुरुष के लक्षण
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Bhagavad Gita Adhyay 15

अध्याय 15: पुरुषोत्तम-योग

  • संसार वृक्ष का कथन
  • भगवत्प्राप्ति का उपाय
  • जीवात्मा का विषय
  • प्रभाव सहित परमेश्वर के स्वरूप का विषय
  • क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम का विषय
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Bhagavad Gita Adhyay 16

अध्याय 16: दैवासुर-सम्पद्विभाग-योग

  • फलसहित दैवी और आसुरी संपदा का कथन
  • आसुरी संपदा वालों के लक्षण
  • आसुरी संपदा वालोंकी अधोगति का कथन
  • शास्त्रविपरीत आचरणों को त्यागने और शास्त्रानुकूल आचरणों के लिए प्रेरणा
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Bhagavad Gita Adhyay 17

अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभाग-योग

  • श्रद्धा और शास्त्रविपरीत घोर तप करने वालों का विषय
  • आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद
  • ॐतत्सत् के प्रयोग की व्याख्या
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Bhagavad Gita Adhyay 18

अध्याय 18: मोक्ष-संन्यास-योग

  • त्याग का विषय
  • कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन
  • तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद
  • फल सहित वर्ण धर्म का विषय
  • ज्ञाननिष्ठा का विषय
  • भक्ति सहित कर्मयोग का विषय
  • श्री गीताजी का माहात्म्य
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समता – Bhagavad Gita Quotes

समता – भगवद्‍गीता अध्याय – २

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय
शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्या:
तांस्तितिक्षस्व भारत॥ (2 – 14)

सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो अनित्य, उत्पत्ति-विनाशशील और क्षणभंगुर है। इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर॥

यं हि न व्यथयन्त्येते
पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं
सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ (2 – 15)

दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है ॥

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समता – भगवद्‍गीता अध्याय – १२

अद्वेष्टा सर्वभूतानां
मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्‍कारः
समदुःखसुखः क्षमी॥ (12 – 13)

जो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित, स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है तथा ….

संतुष्टः सततं योगी
यतात्मा दृढ़निश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो
मद्भक्तः स मे प्रियः॥ (12 – 14)

…. जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है – वह मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥

यस्मान्नोद्विजते लोको
लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः
स च मे प्रियः॥ (12 – 15)

जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादि से रहित है – वह भक्त मुझको प्रिय है॥ (अमर्ष (दूसरे की उन्नति को देखकर संतापित होना)

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष
उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी
यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ (12 – 16)

जो पुरुष आकांक्षा से रहित, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है – वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥

यो न हृष्यति न द्वेष्टि
न शोचति न काङ्‍क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी
भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ (12 – 17)

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है – वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है॥

समः शत्रौ च मित्रे च
तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः
सङ्‍गविवर्जितः ॥ (12 – 18)

जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखादि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है तथा ……..

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी
सन्तुष्टो येन केनचित्‌।
अनिकेतः स्थिरमति:
भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ (12 – 19)

….. जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है)।